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विचित्र ज़िन्दगी

ए ज़िन्दगी तू क्या चाहती है l अपने उन्ग्लिओं पे क्यूँ हमे नचाती है ll मिट्टी समान दिल है हमारा l न छोड़ो हर मोड़ पे बेसहारा ll देते हो खुसिया बेशुमढ़ l फिर लाद देते हो मुसीबतों का पहाड़ ll बरी उबर खाबर है ये तेरी दार्शनिक रेल l ए ज़िन्दगी क्यूँ खेलती हो ऐसी विचित्र खेल ll ज़िन्दगी तुम्हारी इस कठोर सफ़र में l गयें कितनों के अरमान कब्र में ll ज़िन्दगी तुने ये कैसा चक्रव्यू रचा ll धरती पे कोई अभिमन्यु और न बचा ll