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पालूँ तुम को

पास रहकर भी क्यूँ अनजाने हैं हम। रोता है दिल कितना जाने ना हम। पास रहकर भी क्यूँ अनजाने हैं हम। रोता है दिल कितना जाने ना हम। पालूँ तुम को चाहता है मेरा दिल। छोड़ कर सब आकर तू मुझसे मिल। जीवन में इतने हो गए हैं व्यस्त। होती है बातें पर होती नहीं स्पष्ट। बिना कोई कारन होती है गलत फेमियाँ । चाह कर भी मिलती नहीं सारी खुशियाँ। पास रहकर भी क्यूँ अनजाने हैं हम। रोता है दिल कितना जाने ना हम। पास रहकर भी क्यूँ अनजाने हैं हम। रोता है दिल कितना जाने ना हम। 

घुट घुट में रोऊँ

पलक भी न खोली | धुप भी न देखि || पीड़ित इस्कात की | घुट घुट में रोऊँ || संघर्ष की परिभाषा | ग्रस्त में क्या कहूँ || जन्म जो लिए हैं | उनकी दशा सोचनीय है || पीड़ित लिंग भेद की | घुट घुट में रोऊँ || संघर्ष की परिभाषा | ग्रस्त में क्या कहूँ || भाई, पति, सब सही | निस्पक्ष प्रतिस्पर्धा नहीं || पीड़ित ओच्छे समाज की | घुट घुट में रोऊँ || संघर्ष की परिभाषा | ग्रस्त में क्या कहूँ || पुरुष यमराज बन कर | देता दंड कर बलात्कार || पीड़ित नरक की | घुट घुट में रोऊँ || संघर्ष की परिभाषा | ग्रस्त में क्या कहूँ || त्याग हमने किया | पिढ़ायुक्त जीवन जिया || पीड़ित भावनाओं की | घुट घुट में रोऊँ || संघर्ष की परिभाषा | ग्रस्त में क्या कहूँ ||

इ.ऍम.आई

विलाशी जीवन  का भोग I है समस्त दिलों का नारा II आमदनी है कम , तो क्या ? इ.ऍम.आई  का है मज़बूत सहारा II चंद रुपये के किस्त पर I गारी, बंगला सभी लगे प्यारा II मानो खरीदने की होर है I खरीद लाए विलाशी वास्तु सारा II इ.ऍम.आई  से  मिली  आज़ादी ने I सचेत  सोच  को  है मारा II लालसा बराबरी के दबाव में I ज़रुरत का है रूप धारा II उसी आमदनी में I जटिल  होता मनोरम  गुजारा II उधारी से नहीं विलासिता I भूल गए यह विचार धारा II

जीवन संग्राम

जीवन संग्राम कहानी I है बहुत पुरानी II कष्ट और परेशानी I भोगे प्रत्येक प्राणी II समझौतों की जुबानी I इच्छाओं की क़ुरबानी II करे पीढ़ा तूफानी I ऐ मूर्ख अहंमानी II विवाद होंगे मोहिनी I कष्ट होगी चाँदनी II चाहत को रानी I बना निरीह प्राणी II

अज़ादी

देख पक्षी अम्बर में I शेर ज़ोर से गुर्राता है II गुर्राहट सुन निरीह पक्षी I डर से सहम जाता है II अपार कोशिश कर के भी I भयभीत उड़ ना पाता है II निर्मम शेर के समीप I अघात फड फडाता है II शक्ति का दिखावा कर I डरे को डराता है II यहाँ बादशाह मैं हूँ I अहंमानी स्मरण कराता है II खुबसूरत उड़ान भरते हो I केह शेर दुम हिलाता है II राज़ मुझे भी बताओ I पूछ मदहोश गुर्राता है II कौन सी राज़ बताए I व्याकुल समझ ना पाता है II अपने हालात को देख I असहाय निराश हो जाता है II उड़ान की खूबसूरती का I रहस्य बोल ना पाता है II निर्बल निरंकुश के सामने I चुप चाप रेह जाता है II अन्ना, बाबा और कई I देश भर चिंगारी जलाता है II गलत-सही सही-गलत कर I निरंकुश राज्नितिग्ये धौस जताता है II आज़ादी के पंख पहने I भारत उड़ ना पाता है II राज्नितिग्ये के पंजों में I ये उदास फड फडाता है II

शायरी

वो धड़कने आज भी कानों में सुनाई पड़ती है I दिल टूट के चूर है, फिर भी साँसे आहें भरती है II मन को समझाना आशान है, ये दिल से तो हर बहाने बाजी भी डरती है II --------------------------------------------------------------- बिन तुम्हारे एक पल भी ना कटे I उदासी के यह काले बादल चेहरा से ना छठे II जुदाई की बिजली जब सीने में कराक्ति है I आँखों के रास्ते आंसू बरसती है II --------------------------------------------------------------- राह राह पे साथी मिलते रहें I मिला ना जीवन साथी कोई II सपनों का घोरंदा सपना ही रेह गया I रेहने ना आया इसमे कोई II --------------------------------------------------------------- ज़िन्दगी थमती नहीं, ये तो केवल मान्सिक ठराव है II इस हार को हार मत समझना I ये उन्नति का पेहला पराव है II

महँगाई

महँगाई ने चादर छोटी कर दी l अध् नग्न होकर घूम रहा हूँ ll महँगाई ने शर्म भी छीन ली l बेशरम होकर घूम रहा हूँ ll अपनी भूख मिटानी मुश्किल है l पूरे परिवार की कैसे मिटाऊँ ll मेहनत करके जितना कमाता हूँ l उतने में खाना कहाँ से लाऊँ ll महँगाई ने ऐसा भयंकर रूप धारा है l गरीब की छोड़ो मध्यम वर्ग भी बेसहारा है ll फिर भी हमारे नेता इस से मुँह मोड़ रहे हैं l तरक्की के सामने स्फीति को छोड़ रहे हैं ll भारत की तरक्की दिनों दिन बढ़ रही है l इसकी तरक्की से सारी दुनिया डर रही है ll भारत में गरीबी भी बढ़ रही है l सिर्फ गरीबी ही इससे डर रही है ll जिस वर्ष फ़स्ल अच्छी होती है l हम गरीबों को थोड़ी राहत रहती है ll और जिस वर्ष फ़स्ल बिगड़ जाये l तेल और मंदी भी बहकती है ll सब मिलके हमे बेहाल करती है l महँगाई से भूख बहुत डरती है ll