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शायरी

वो धड़कने आज भी कानों में सुनाई पड़ती है I दिल टूट के चूर है, फिर भी साँसे आहें भरती है II मन को समझाना आशान है, ये दिल से तो हर बहाने बाजी भी डरती है II --------------------------------------------------------------- बिन तुम्हारे एक पल भी ना कटे I उदासी के यह काले बादल चेहरा से ना छठे II जुदाई की बिजली जब सीने में कराक्ति है I आँखों के रास्ते आंसू बरसती है II --------------------------------------------------------------- राह राह पे साथी मिलते रहें I मिला ना जीवन साथी कोई II सपनों का घोरंदा सपना ही रेह गया I रेहने ना आया इसमे कोई II --------------------------------------------------------------- ज़िन्दगी थमती नहीं, ये तो केवल मान्सिक ठराव है II इस हार को हार मत समझना I ये उन्नति का पेहला पराव है II

महँगाई

महँगाई ने चादर छोटी कर दी l अध् नग्न होकर घूम रहा हूँ ll महँगाई ने शर्म भी छीन ली l बेशरम होकर घूम रहा हूँ ll अपनी भूख मिटानी मुश्किल है l पूरे परिवार की कैसे मिटाऊँ ll मेहनत करके जितना कमाता हूँ l उतने में खाना कहाँ से लाऊँ ll महँगाई ने ऐसा भयंकर रूप धारा है l गरीब की छोड़ो मध्यम वर्ग भी बेसहारा है ll फिर भी हमारे नेता इस से मुँह मोड़ रहे हैं l तरक्की के सामने स्फीति को छोड़ रहे हैं ll भारत की तरक्की दिनों दिन बढ़ रही है l इसकी तरक्की से सारी दुनिया डर रही है ll भारत में गरीबी भी बढ़ रही है l सिर्फ गरीबी ही इससे डर रही है ll जिस वर्ष फ़स्ल अच्छी होती है l हम गरीबों को थोड़ी राहत रहती है ll और जिस वर्ष फ़स्ल बिगड़ जाये l तेल और मंदी भी बहकती है ll सब मिलके हमे बेहाल करती है l महँगाई से भूख बहुत डरती है ll

धरती छोड़- कुछ नहीं हमारे पास ।

मैं किसान हूँ भारत का । शिकार हूँ औद्योगिकरण नामक आफत का । ये कैसा छल रचाया जा रहा है, विकास के दौर में- मुझे क्यूं कुचला जा रहा है ।। क्या मैं भारत का नागरिक नहीं ? क्या संविधान के अधिकार में, मैं शरीक नहीं ? क्या मेरे सपने नहीं ? क्या देशवासियों, आप मेरे अपने नहीं ? मेरे परिश्रम और पसीने इतने अल्प नहीं I देशवासियों,मुझ किसानों का कोई विकल्प नहीं ।। मैं भारत का किसान हूँ । हर फसल की मैं जान हूँ । हर अन्न जो सारा भारत खाता है, वो हमारे श्रम से ही आता है ।। मैं भी भारत की सफलता चाहता हूँ । हर वक्त, मैं भी भारत का गाना गाता हूँ । देशवासियों आपको कैसे दिलाऊं विष्वास, धरती छोड़- कुछ नहीं हमारे पास ।।

विचित्र ज़िन्दगी

ए ज़िन्दगी तू क्या चाहती है l अपने उन्ग्लिओं पे क्यूँ हमे नचाती है ll मिट्टी समान दिल है हमारा l न छोड़ो हर मोड़ पे बेसहारा ll देते हो खुसिया बेशुमढ़ l फिर लाद देते हो मुसीबतों का पहाड़ ll बरी उबर खाबर है ये तेरी दार्शनिक रेल l ए ज़िन्दगी क्यूँ खेलती हो ऐसी विचित्र खेल ll ज़िन्दगी तुम्हारी इस कठोर सफ़र में l गयें कितनों के अरमान कब्र में ll ज़िन्दगी तुने ये कैसा चक्रव्यू रचा ll धरती पे कोई अभिमन्यु और न बचा ll

ভাঙ্গা স্বপ্ন

এই যে ছেড়ে গেলে আমাকে l তুমি কষ্ট যে দিয়ে ছ আমাকে ll আমি কোনো দিন ভাভি নি l তুমি এই ভাভে ভাঙবে স্বপ্ন কে ll আমি যে ভালো বেশে ছিলাম l এই প্রান যে তুমাকে দিয়েছিলাম ll তুমি এর কদর দাউ নি l ছেড়ে দিয়ে আমাকে দিলে শুদু ঘ্যাম ll আমি আর তুমাকে দেখব না l আমি আর তুমাকে ভালো বাসব না ll আমি জানি আমি পারব না l তাই এই প্রিথ্ভি তে আর থাকব না ll

यादें

नशे का शौक नहीं l खोजता हूँ खुशिया वही ll इसलिए तन्हाईओं में बैठ, पीता हूँ l उन यादों को याद कर जीता हूँ ll उन यादों को याद कर जीता हूँ l हाथों में शराब लिए मुस्कुराता हूँ ll ये शराब जब सीने में जाती है l यादें तस्वीर बनकर सामने आती है ll

ये पल

कुछ पल की है यह ज़िन्दगी l आओ साथ मुस्कुराएँ ll ये पल ना मिलेंगे दोबारा l अंत में - जब हम पछताएँ ll