विचित्र ज़िन्दगी

ए ज़िन्दगी तू क्या चाहती है l
अपने उन्ग्लिओं पे क्यूँ हमे नचाती है ll
मिट्टी समान दिल है हमारा l
न छोड़ो हर मोड़ पे बेसहारा ll

देते हो खुसिया बेशुमढ़ l
फिर लाद देते हो मुसीबतों का पहाड़ ll
बरी उबर खाबर है ये तेरी दार्शनिक रेल l
ए ज़िन्दगी क्यूँ खेलती हो ऐसी विचित्र खेल ll

ज़िन्दगी तुम्हारी इस कठोर सफ़र में l
गयें कितनों के अरमान कब्र में ll
ज़िन्दगी तुने ये कैसा चक्रव्यू रचा ll
धरती पे कोई अभिमन्यु और न बचा ll

Comments

  1. Zindagi ke rang,
    Apne dosto ke sang.
    yaad rakh har lamha jo tune bitaiye,
    Na ki wo , jisme zindagi ne tujhe rulaye.

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