विचित्र ज़िन्दगी
ए ज़िन्दगी तू क्या चाहती है l
अपने उन्ग्लिओं पे क्यूँ हमे नचाती है ll
मिट्टी समान दिल है हमारा l
न छोड़ो हर मोड़ पे बेसहारा ll
देते हो खुसिया बेशुमढ़ l
फिर लाद देते हो मुसीबतों का पहाड़ ll
बरी उबर खाबर है ये तेरी दार्शनिक रेल l
ए ज़िन्दगी क्यूँ खेलती हो ऐसी विचित्र खेल ll
ज़िन्दगी तुम्हारी इस कठोर सफ़र में l
गयें कितनों के अरमान कब्र में ll
ज़िन्दगी तुने ये कैसा चक्रव्यू रचा ll
धरती पे कोई अभिमन्यु और न बचा ll
Wah wah!!!!
ReplyDeleteZindagi ke rang,
ReplyDeleteApne dosto ke sang.
yaad rakh har lamha jo tune bitaiye,
Na ki wo , jisme zindagi ne tujhe rulaye.
BEAUTIFUL POEM..
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