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इ.ऍम.आई

विलाशी जीवन  का भोग I है समस्त दिलों का नारा II आमदनी है कम , तो क्या ? इ.ऍम.आई  का है मज़बूत सहारा II चंद रुपये के किस्त पर I गारी, बंगला सभी लगे प्यारा II मानो खरीदने की होर है I खरीद लाए विलाशी वास्तु सारा II इ.ऍम.आई  से  मिली  आज़ादी ने I सचेत  सोच  को  है मारा II लालसा बराबरी के दबाव में I ज़रुरत का है रूप धारा II उसी आमदनी में I जटिल  होता मनोरम  गुजारा II उधारी से नहीं विलासिता I भूल गए यह विचार धारा II

जीवन संग्राम

जीवन संग्राम कहानी I है बहुत पुरानी II कष्ट और परेशानी I भोगे प्रत्येक प्राणी II समझौतों की जुबानी I इच्छाओं की क़ुरबानी II करे पीढ़ा तूफानी I ऐ मूर्ख अहंमानी II विवाद होंगे मोहिनी I कष्ट होगी चाँदनी II चाहत को रानी I बना निरीह प्राणी II

अज़ादी

देख पक्षी अम्बर में I शेर ज़ोर से गुर्राता है II गुर्राहट सुन निरीह पक्षी I डर से सहम जाता है II अपार कोशिश कर के भी I भयभीत उड़ ना पाता है II निर्मम शेर के समीप I अघात फड फडाता है II शक्ति का दिखावा कर I डरे को डराता है II यहाँ बादशाह मैं हूँ I अहंमानी स्मरण कराता है II खुबसूरत उड़ान भरते हो I केह शेर दुम हिलाता है II राज़ मुझे भी बताओ I पूछ मदहोश गुर्राता है II कौन सी राज़ बताए I व्याकुल समझ ना पाता है II अपने हालात को देख I असहाय निराश हो जाता है II उड़ान की खूबसूरती का I रहस्य बोल ना पाता है II निर्बल निरंकुश के सामने I चुप चाप रेह जाता है II अन्ना, बाबा और कई I देश भर चिंगारी जलाता है II गलत-सही सही-गलत कर I निरंकुश राज्नितिग्ये धौस जताता है II आज़ादी के पंख पहने I भारत उड़ ना पाता है II राज्नितिग्ये के पंजों में I ये उदास फड फडाता है II