महँगाई
महँगाई ने चादर छोटी कर दी l
अध् नग्न होकर घूम रहा हूँ ll
महँगाई ने शर्म भी छीन ली l
बेशरम होकर घूम रहा हूँ ll
अपनी भूख मिटानी मुश्किल है l
पूरे परिवार की कैसे मिटाऊँ ll
मेहनत करके जितना कमाता हूँ l
उतने में खाना कहाँ से लाऊँ ll
महँगाई ने ऐसा भयंकर रूप धारा है l
गरीब की छोड़ो मध्यम वर्ग भी बेसहारा है ll
फिर भी हमारे नेता इस से मुँह मोड़ रहे हैं l
तरक्की के सामने स्फीति को छोड़ रहे हैं ll
भारत की तरक्की दिनों दिन बढ़ रही है l
इसकी तरक्की से सारी दुनिया डर रही है ll
भारत में गरीबी भी बढ़ रही है l
सिर्फ गरीबी ही इससे डर रही है ll
जिस वर्ष फ़स्ल अच्छी होती है l
हम गरीबों को थोड़ी राहत रहती है ll
और जिस वर्ष फ़स्ल बिगड़ जाये l
तेल और मंदी भी बहकती है ll
सब मिलके हमे बेहाल करती है l
महँगाई से भूख बहुत डरती है ll
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