धरती छोड़- कुछ नहीं हमारे पास ।

मैं किसान हूँ भारत का ।
शिकार हूँ औद्योगिकरण नामक आफत का ।
ये कैसा छल रचाया जा रहा है,
विकास के दौर में- मुझे क्यूं कुचला जा रहा है ।।

क्या मैं भारत का नागरिक नहीं ?
क्या संविधान के अधिकार में, मैं शरीक नहीं ?
क्या मेरे सपने नहीं ?
क्या देशवासियों, आप मेरे अपने नहीं ?
मेरे परिश्रम और पसीने इतने अल्प नहीं I
देशवासियों,मुझ किसानों का कोई विकल्प नहीं ।।

मैं भारत का किसान हूँ ।
हर फसल की मैं जान हूँ ।
हर अन्न जो सारा भारत खाता है,
वो हमारे श्रम से ही आता है ।।

मैं भी भारत की सफलता चाहता हूँ ।
हर वक्त, मैं भी भारत का गाना गाता हूँ ।
देशवासियों आपको कैसे दिलाऊं विष्वास,
धरती छोड़- कुछ नहीं हमारे पास ।।

Comments

  1. Bahut hi asardaar kavita hai...samvidhan ke rakhwalon ko padhna chahiye aur samajhna chahiye ki woh jo kar rahe hai, usse desh ko kitna labh prapt ho raha hai..Oshadharon!

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